Kishau Dam Project: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में वर्षों से लंबित किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना को लेकर बड़ा फैसला लिया गया। बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान ने परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर सहमति जताई।
यह सहमति परियोजना को ज़मीन पर उतारने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है। MOU पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा।
बैठक में केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों सहित प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।

छह राज्यों की सहमति से आगे बढ़ी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना से संबंधित मुख्य बिंदु
- छह राज्यों ने किशाऊ बांध परियोजना को मंजूरी दी।
- दिल्ली को 372 एमजीडी अतिरिक्त पेयजल मिलने की उम्मीद।
- 97,076 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी।
- केंद्र सरकार जल घटक की 90 प्रतिशत लागत वहन करेगी।
- परियोजना से यमुना के पुनर्जीवन और जलविद्युत उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
- लगभग 900 परिवार और 17 गांव परियोजना से प्रभावित होंगे।
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यमुना के पुनर्जीवन में किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना की अहम भूमिका
किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना केवल एक जलाशय नहीं बल्कि यमुना नदी के पुनर्जीवन की बड़ी योजना का हिस्सा है। लंबे समय से यमुना में स्वच्छ जल प्रवाह की कमी बनी हुई है, जिससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हुआ है। परियोजना के पूरा होने पर टोंस नदी का जल नियंत्रित रूप से यमुना में छोड़ा जाएगा, जिससे नदी में साफ पानी का प्रवाह बढ़ेगा और पर्यावरणीय संतुलन सुधारने में मदद मिलेगी। यह निर्णय स्वच्छ और निर्मल यमुना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
दिल्ली के जल संकट को दूर करने में मिलेगी बड़ी मदद
दिल्ली अपनी पेयजल आवश्यकताओं के लिए आज भी काफी हद तक पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। वर्तमान में राजधानी को प्रतिदिन लगभग 1250 मिलियन गैलन पानी की आवश्यकता होती है, जबकि उपलब्धता लगभग 1000 एमजीडी है। यानी शहर को जरूरत से सीसी लगभग 22 प्रतिशत कम पानी मिल रहा है।
किशाऊ बांध परियोजना के पूरा होने के बाद दिल्ली को लगभग 372 एमजीडी अतिरिक्त पेयजल मिलने की उम्मीद है। इससे राजधानी में बढ़ती आबादी के साथ बढ़ रही जल आवश्यकता को पूरा करने में बड़ी मदद मिलेगी। अनुमान है कि वर्ष 2031 तक दिल्ली की पानी की मांग बढ़कर 1746 एमजीडी तक पहुंच जाएगी। ऐसे में यह परियोजना भविष्य के जल संकट से निपटने का मजबूत आधार बन सकती है।
सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा
किशाऊ बांध का निर्माण टोंस नदी पर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर किया जाएगा। बांध की ऊंचाई 236 मीटर और लंबाई 680 मीटर होगी, जिससे यह टिहरी बांध के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध बनेगा।
परियोजना के पूरा होने के बाद हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लगभग 97,076 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इससे किसानों को वर्षभर बेहतर जल उपलब्ध होगी और कृषि उत्पादन में वृद्धि की संभावना बढ़ेगी। इसके साथ ही परियोजना से जलविद्युत उत्पादन भी होगी, जिससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगी।
90 प्रतिशत खर्च उठाएगी केंद्र सरकार
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि परियोजना के जल घटक पर आने वाली लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी। शेष 10 प्रतिशत लागत छह राज्यों द्वारा वहन करेंगे।
इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत साझा करने के बदले उसके हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराने पर भी सहमति बनी। इससे सभी राज्यों के हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।
टिहरी के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध
किशाऊ बांध हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र के मोहराड़ और उत्तराखंड के त्यूणी क्षेत्र के बीच बनाया जाएगा। परियोजना के तहत लगभग 32 किलोमीटर लंबी विशाल झील निर्माण होगी। केंद्र सरकार ने वर्ष 2008 में इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया था, लेकिन विभिन्न कारणों से इसका कार्य लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सका। अब छह राज्यों की सहमति मिलने के बाद इसके निर्माण के रास्ते लगभग साफ हो चुके है।
सैकड़ों परिवारों और कई गांवों पर पड़ेगा असर
परियोजना से जहां लाखों लोगों को लाभ मिलेगा, वहीं इसके सामाजिक प्रभाव भी काफी बड़े होंगे। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की जद में लगभग 81,300 पेड़, 631 लकड़ी के मकान, 171 पक्के मकान, आठ मंदिर, दो अस्पताल, सात प्राथमिक विद्यालय, दो माध्यमिक विद्यालय, एक इंटर कॉलेज और छह पंचायतें आएंगी।
परियोजना के कारण हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लगभग 900 परिवार प्रभावित होंगे। कुल 2950 हेक्टेयर भूमि जलमग्न होगी, जिसमें हिमाचल प्रदेश की 1498 हेक्टेयर और उत्तराखंड की 1452 हेक्टेयर भूमि शामिल है।
किशाऊ बांध बनने से हिमाचल प्रदेश के शिलाई क्षेत्र में पड़ेगा सीधा प्रभाव
किशाऊ बांध बनने से हिमाचल प्रदेश के शिलाई क्षेत्र के मोहराड़, मशवाड़, कंड्यारी, नेरा, बड़ालानी, सियासु, थनाणा और धारवा सहित कई गांव प्रभावित होंगे। इसके अलावा शिमला जिले के गुम्मा, फेलग और अंतरोली तथा उत्तराखंड के क्वानु, सावर और कोटा सहित कुल 17 गांव परियोजना की जद में आएंगे।
इन गांवों के लोगों के पुनर्वास और उचित मुआवजे की व्यवस्था परियोजना की सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
अन्य बांध परियोजनाओं के साथ बदलेगी राजधानी की जल व्यवस्था
किशाऊ बांध के अलावा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में लखवार बांध तथा रेणुकाजी बांध परियोजनाओं पर भी कार्य चल रही है। ये तीनों परियोजनाएं पूरी होने के बाद दिल्ली की पेयजल आपूर्ति में बड़ा सुधार होने की उम्मीद है। साथ ही यमुना नदी के जल प्रवाह को संतुलित रखने और उत्तर भारत में जल प्रबंधन को मजबूत बनाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
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छह राज्यों की सहमति से आगे बढ़ी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना, से संबंधित मुख्य FAQs
1. किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना क्या है?
यह यमुना की सहायक टोंस नदी पर बनने वाली राष्ट्रीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य पेयजल उपलब्ध कराना, सिंचाई बढ़ाना, जलविद्युत उत्पादन करना और यमुना के जल प्रवाह में सुधार लाना है।
2. किशाऊ बांध कहां बनाया जाएगा?
यह बांध हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले और उत्तराखंड के देहरादून जिले की सीमा पर टोंस नदी पर बनाया जाएगा।
3. दिल्ली को इस परियोजना से क्या लाभ होगा?
परियोजना पूरी होने के बाद दिल्ली को लगभग 372 मिलियन गैलन प्रतिदिन अतिरिक्त पेयजल मिलेगा, जिससे भविष्य की बढ़ती जल मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।
4. परियोजना से किन राज्यों को लाभ मिलेगा?
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को पेयजल, सिंचाई, बिजली और जल प्रबंधन के रूप में लाभ मिलेगा।
5. क्या इस परियोजना से लोग प्रभावित भी होंगे?
इस परियोजना के कारण लगभग 900 परिवार, 17 गांव, कई सार्वजनिक संस्थान और हज़ारों पेड़ प्रभावित होंगे तथा कुछ क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे।
6. परियोजना की लागत कौन वहन करेगा?
जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत खर्च छह संबंधित राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा।

















