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अजीत डोभाल: भारत के चाणक्य और राष्ट्र की सुरक्षा के स्तंभ

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अजीत डोभाल भारत के चाणक्य और राष्ट्र की सुरक्षा के स्तंभ

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल (Ajit Doval) का नाम सुनते ही मन में एक ऐसे शख्स की छवि बनती है जो शांत, गंभीर और बेहद प्रभावशाली है। उन्हें अक्सर “भारत का जेम्स बॉन्ड” कहा जाता है, और यह उपनाम यूं ही नहीं दिया गया। उनका जीवन जासूसी, जोखिम भरे मिशनों और देश की सुरक्षा के प्रति अटूट समर्पण से भरा हुआ है।

अजीत डोभाल सिर्फ एक सरकारी अधिकारी नहीं, बल्कि एक ऐसे रणनीतिकार हैं जिन्होंने भारत की सुरक्षा नीतियों को एक नई दिशा दी है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से, वह लगातार इस महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं, जो उनकी काबिलियत और प्रधानमंत्री के उन पर गहरे विश्वास को दर्शाता है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम अजीत डोभाल के जीवन, उनकी उपलब्धियों, जासूसी के रोमांचक किस्सों और देश की सुरक्षा में उनके अभूतपूर्व योगदान पर गहराई से बात करेंगे।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा: एक साधारण शुरुआत से असाधारण सफर

अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी, 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में हुआ था। उनके पिता, मेजर जी.एन. डोभाल, भारतीय सेना में एक अधिकारी थे। उनका सैन्य परिवार से आना उनके अंदर बचपन से ही अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना को भर चुका था।

  • स्कूली शिक्षा: उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा अजमेर के मिलिट्री स्कूल से पूरी की। यह स्कूल भारत के कुछ सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक है, जिसने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • उच्च शिक्षा: इसके बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में मास्टर्स डिग्री (M.A.) प्राप्त की। 1968 में, उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की परीक्षा पास की और केरल कैडर में उन्हें नियुक्ति मिली।

आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका करियर शुरू हुआ, लेकिन उनका असली सफर तब शुरू हुआ जब 1972 में उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ज्वाइन किया। यहीं से उनके जीवन की सबसे रोमांचक और जोखिम भरी कहानी की शुरुआत हुई।

जासूसी के किस्से: “छद्मवेष” के माहिर रणनीतिकार

अजीत डोभाल की कहानी बिना उनकी जासूसी के किस्सों के अधूरी है। उन्होंने अपनी सेवा के 37 साल में से 33 साल खुफिया विभाग में बिताए। उनके बारे में कई ऐसे किस्से प्रचलित हैं जो किसी हॉलीवुड फिल्म की कहानी से कम नहीं हैं।

  • पाकिस्तान में 7 साल: डोभाल ने 7 साल तक पाकिस्तान में एक जासूस के रूप में काम किया। वे वहां एक पाकिस्तानी मुस्लिम के रूप में रहे और खुफिया जानकारी इकट्ठा करते रहे। एक बार उन्होंने एक मस्जिद में जाकर खुद को पाकिस्तानी बताया और कहा कि वे मुस्लिम हैं। जब उनसे उनका पता पूछा गया तो उन्होंने लाहौर में रहने का दावा किया, लेकिन मस्जिद के मौलवी ने उनके लहजे से पहचान लिया कि वे भारतीय हैं। डोभाल ने यह स्वीकार किया और मौलवी से कहा कि वे एक जासूस हैं। मौलवी ने न केवल उन्हें जाने दिया बल्कि यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़े तो वे उनसे मदद ले सकते हैं। इस घटना से डोभाल की बहादुरी और रणनीति का पता चलता है।
  • ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): इस ऑपरेशन को सफल बनाने में भी डोभाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने स्वर्ण मंदिर में आतंकवादियों के बीच रिक्शा चालक बनकर घुसपैठ की और खुफिया जानकारी जुटाई। उन्होंने आतंकवादियों के साथ उनके ठिकानों, हथियारों और रणनीतियों की पूरी जानकारी हासिल की। उनकी यह जानकारी ऑपरेशन की सफलता के लिए निर्णायक साबित हुई।
  • जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटना: 90 के दशक में जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब डोभाल ने आतंकवादियों को सरेंडर करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आतंकवादी संगठनों के अंदर घुसकर उनमें फूट डाली और कई बड़े आतंकवादियों को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मनाया। यह उनकी कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक समझ का परिणाम था।
  • कंधार हाईजैक (1999): एयर इंडिया की फ्लाइट IC-814 के अपहरण के दौरान, डोभाल मुख्य वार्ताकार थे। उन्होंने भारत सरकार की ओर से आतंकवादियों से बातचीत की और यात्रियों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के रूप में योगदान

2014 में अजीत डोभाल को भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत की सुरक्षा और विदेश नीति को एक नया आयाम दिया है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण और साहसिक निर्णय लिए।

  • सर्जिकल स्ट्राइक (2016): उरी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया। यह डोभाल की रणनीति का ही परिणाम था। उन्होंने इस ऑपरेशन की पूरी योजना बनाई और उसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस ऑपरेशन ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाएगा।
  • बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019): पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में हवाई हमला किया। इस ऑपरेशन का श्रेय भी डोभाल की रणनीतिक सोच को दिया जाता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हमला सटीक हो और आतंकी ठिकानों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाए। यह भारत की आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का एक और उदाहरण था।
  • डोकलाम गतिरोध (2017): चीन के साथ हुए डोकलाम गतिरोध को सुलझाने में भी डोभाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने चीन के साथ बैक-चैनल डिप्लोमेसी का उपयोग किया और युद्ध की स्थिति को टालते हुए भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा की। उनकी इस कूटनीतिक सफलता की काफी सराहना हुई।
  • अनुच्छेद 370 हटाना: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के फैसले में भी उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने इस फैसले के बाद राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा तैयारियों की देखरेख की।

भारत की सुरक्षा रणनीति में डोभाल का प्रभाव

अजीत डोभाल ने भारत की सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव लाया है। उनका मानना है कि “आप दुश्मन को वहां मारें जहां उसे सबसे ज्यादा चोट लगे।” इसी सिद्धांत पर उन्होंने भारत की रक्षा और सुरक्षा नीतियों को आकार दिया है।

  • आक्रामक रक्षा (Offensive Defence): डोभाल की रणनीति “आक्रामक रक्षा” पर आधारित है। इसका मतलब है कि भारत को सिर्फ अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मनों को उनकी ही जमीन पर सबक सिखाना चाहिए।
  • आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक रणनीति: डोभाल ने आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत और साझा वैश्विक रणनीति बनाने पर जोर दिया है। उन्होंने विभिन्न देशों के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने के लिए खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त कार्रवाई करने की वकालत की है।
  • साइबर सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में, उन्होंने भारत की साइबर सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) को और अधिक प्रभावी बनाया है।

डोभाल के बारे में कुछ रोचक तथ्य | Facts about Ajit Doval in Hindi

  • अजीत डोभाल ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित होने वाले पहले पुलिस अधिकारी हैं। उन्हें यह सम्मान मिजोरम और पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियानों में उनकी बहादुरी के लिए दिया गया था।
  • वह 2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक के पद से रिटायर हुए थे।
  • वह चीन, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं।
  • उन्हें अक्सर भारत के प्रधानमंत्री के “सबसे भरोसेमंद अधिकारी” के रूप में देखा जाता है।

निष्कर्ष: देश के प्रति अटूट समर्पण

अजीत डोभाल का जीवन एक आईपीएस अधिकारी से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने तक का सफर है। उनकी कहानी हमें बताती है कि कैसे एक व्यक्ति का साहस, बुद्धिमत्ता और देश के प्रति अटूट समर्पण राष्ट्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। 

उन्होंने न केवल भारत की सुरक्षा नीतियों को मजबूत किया है, बल्कि देश को एक नया आत्मविश्वास भी दिया है। उनकी रणनीतिक सोच और कार्यशैली ने भारत को क्षेत्रीय और वैश्विक मंच पर एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।

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