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केरलम के पवित्र उपवनों का जीर्णोद्धार करने के लिए कावू पुनर्स्थापन और संरक्षण पायलट कार्यक्रम किया गया लॉन्च

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केरलम का कावू पुनर्स्थापन कार्यक्रम: पवित्र उपवनों का संरक्षण

केरलम की समृद्ध जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए कावू पुनर्स्थापन और संरक्षण पायलट कार्यक्रम (Kavu Restoration and Conservation Pilot Programme) की शुरुआत की गई है। केरलम राज्य जैव विविधता बोर्ड (KSBB) द्वारा शुरू किए गए इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य राज्य के पारंपरिक ‘कावू’ या पवित्र उपवनों (Sacred Groves) को पुनर्जीवित करना है।

इस कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन 5 मार्च, 2026 को एर्नाकुलम के एझिक्करा में स्थित पेरुमबदन्ना वनदुर्गा कावू में किया गया।

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कार्यक्रम की रूपरेखा (Programme Overview)

यह पहल स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) के सहयोग से लागू की जा रही है। शुरुआती चरण में मॉडल साइट के रूप में पाँच विशिष्ट स्थानों को चुना गया है:

जिलाचयनित पायलट स्थल
एर्नाकुलमएझिक्करा (पेरुमबदन्ना वनदुर्गा कावू)
पलक्कड़पट्टांचेरी
कोझिकोडविल्लियपल्ली
कन्नूरइरीट्टी
कासरगोडउदुमा

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प्रमुख गतिविधियाँ और लक्ष्य

बढ़ते शहरीकरण और आक्रामक प्रजातियों (Invasive Species) के कारण इन उपवनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इसे रोकने के लिए कार्यक्रम के तहत निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं:

  • कावू नर्सरी की स्थापना: उपवनों में पाई जाने वाली स्थानीय और लुप्तप्राय पौधों की प्रजातियों को उगाने के लिए विशेष नर्सरी बनाई जा रही हैं।
  • बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण: लगभग 100 से अधिक स्थानीय प्रजातियों (जैसे Vateria indica, Saraca asoca) के करीब 3,000 पौधे इन स्थलों पर लगाए जाएंगे।
  • आक्रामक प्रजातियों और कचरे का उन्मूलन: उपवनों से प्लास्टिक कचरे और हानिकारक आक्रामक पौधों को हटाया जा रहा है।
  • जल संरक्षण: उपवनों से जुड़े पारंपरिक तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाएगा ताकि गर्मियों में स्थानीय वन्यजीवों को पानी मिल सके।
  • जैव-बाड़ (Bio-fencing): बाहरी अतिक्रमण से सुरक्षा के लिए स्थानीय पौधों का उपयोग करके प्राकृतिक बाड़ बनाई जाएगी।
  • कानूनी संरक्षण: उपयुक्त उपवनों को ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ के रूप में घोषित करने का भी प्रयास किया जाएगा।

‘कावू’ का पारिस्थितिक महत्व

पवित्र उपवन केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं:

  • प्राकृतिक भंडार: ये दुर्लभ और औषधीय पौधों के लिए भंडार गृह के रूप में कार्य करते हैं।
  • जल और मृदा संरक्षण: ये उपवन मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और स्थानीय जल स्तर को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • सामुदायिक संरक्षण: यह समुदाय-आधारित संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है जहाँ स्थानीय लोग सदियों से प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं।

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संत रामपाल जी महाराज ने खोले प्रकृति के भेद

जहाँ सरकार इन पवित्र उपवनों के संरक्षण के लिए भौतिक प्रयास कर रही है, वहीं संत रामपाल जी महाराज हमें इसके सृजनकर्ता के बारे में समझाते हैं। वे बताते हैं कि पूरी प्रकृति परमेश्वर कबीर साहेब की रचना है । सम्पूर्ण सृष्टि रचना यहाँ पर सुनी जा सकती है । संत रामपाल जी महराज समय समय पर प्रकृति के बचाव और रख रखाव के लिए वृक्षारोपण अभियान भी चलाते रहते हैं । फिलहाल अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से किसान गरीब मजदूर वर्ग के उत्थान के लिए दिन रात एक करके काम कर रहे हैं । 

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. केरलम में पवित्र उपवनों को क्या कहा जाता है?

इन्हें स्थानीय भाषा में ‘कावू’ (Kavu) कहा जाता है।

2. इस पायलट कार्यक्रम को कौन लागू कर रहा है?

इसे केरलम राज्य जैव विविधता बोर्ड (KSBB) स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों के साथ मिलकर लागू कर रहा है।

3. इस पहल के तहत कितने पौधे लगाए जाने का लक्ष्य है?

करीब 100 प्रजातियों के 3,000 पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है।

4. क्या इन उपवनों को कानूनी संरक्षण मिलेगा?

हाँ, इन्हें जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ घोषित करने की योजना है।

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